मैं झारखण्ड हूँ। आज मैं 25 साल का हो गया हूं। 15 नवंबर 2000 को मैंने अपनी अलग पहचान पाई थी, जल, जंगल और जमीन की इस धरती पर मेरा अस्तित्व बना। लेकिन मैं सिर्फ एक नयी मानचित्र की रेखा नहीं हूँ , मैं उन सपनों, संघर्षों और उम्मीदों की कहानी हूँ, जो इस धरती पर जीते, लड़ते और बसते लोगों के हैं। मेरी गोद में छिपा है असीमित खजाना - कोयला, लौह अयस्क, इधर-उधर बिखरे खनिजों का एक समृद्ध भंडार। मैं अपनी गहरी जमीन के भीतर संसाधनों को संजोए हुए हूँ। मेरी नदियाँ गुनगुनाती हैं, पहाड़ मेरी रीढ़ हैं, जंगल मेरी सांस हैं, और झरने संगीत। लेकिन, मेरा संघर्ष भी उतना ही पुराना है जितना कि मेरी खोई उम्मीदों की कहानी। 25 साल बीत जाने के बाद भी, मैं उस मुकाम तक नहीं पहुंच सका, जिसकी कल्पना मुझमें बसाई गई थी। मेरा राजनीतिक जीवन कभी ठहराव नहीं देख पाया। तमाम उतार-चढ़ाव ने मेरी राहों को थका दिया। सरकारें बदलती रहीं, मेरे विकास की गति को स्थिरता नहीं मिल सकी। मेरा गरीब चेहरा भी सामने है। गरीबी आज भी मेरे कई हिस्सों में दबी पड़ी है। 70 प्रतिशत महिलाएं एनिमिया से जूझ रही हैं। स्वस्थ्य व्यवस्था ऐसी है कि मुझे यह कहने में गुरेज नहीं कि मैं वेंटिलेटर पर हूँ। अस्पतालों में बुनियादी संसाधनों की कमी, डॉक्टरों की तंगी, और ग्रामीण-आदिवासी इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच का अभाव मेरी चिंता है। शिक्षा के मोर्चे पर काम तो हुआ है, लेकिन उसकी चाल धीमी है। मैंने नए स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का दरवाज़ा खोला, लेकिन वहाँ संसाधन, शिक्षक और बुनियादी ढांचा अक्सर अधूरा रह जाता है। युवाओं को उच्च शिक्षा के लिए बेहतर अवसर चाहिए, लेकिन अभी भी उनमें उसी भरोसे की कमी है। बहुतों को लगता है कि इन 25 वर्षों में मेरी पढ़ाई-लिखाई की कहानी अधूरी ही रही है।
रोजगार? यह मेरी सबसे बड़ी पुस्तक का अलिखित पन्ना है। मैंने अपनी जमीन से खनिजों को निकालने की ताकत तो जगाई, पर न वे उद्योग अपनी पूरी शक्ति से उभरे, न ही उत्पादन-आधारित बड़े कारखाने खड़े हो पाए। इस वजह से मेरी युवा पीढ़ी कहीं और काम की तलाश में पलायन के लिए मजबूर है। फिर भी, मैं हारा नहीं हूँ। मैं आगे बढ़ रहा हूँ, लेकिन मेरी रफ़्तार उतनी तेज नहीं जितनी मेरी आकांक्षाएँ थीं। मैं अपनी सांस्कृतिक धरोहर पर गर्व करता हूं आदिवासी जीवन, नृत्य, लोककथाएँ, जंगलों की कहानियाँ ये मेरी आत्मा हैं। लेकिन सिर्फ आत्मा से राज्य नहीं चल सकता, मुझे व्यवहार की ज़रूरत है। मुझे साफ़-सुथरी सड़कों, शिक्षा-संस्थानों, अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं और उत्पादन-उद्योगों की ज़रूरत है ताकि मैं खुद को पूरी तरह खड़ा कर सकूँ। मेरा दर्द यह है कि जब मेरा राज्य बना था, वह उम्मीदों और भीड़-भाड़ वाले सपनों के साथ बना था। लोग कहते थे यहाँ सब कुछ है नदियाँ, खनिज, जमीन, और लोग। मगर जिस तरह देखभाल होनी चाहिए थी, वह उतनी गहरी नहीं हुई। मेरे विकास की पीठिका लिखी गई, लेकिन मेरे आगे के पन्ने लगभग खाली ही रह गए।
मुझे याद है, मेरे प्यारे झारखंडवासियों ने मुझे एक अवसर के रूप में देखा था विकास की नई पहचान, खुद-निर्भरता, और आर्थिक सम्पन्नता का। मैं जानता हूँ कि मेरी पूरी क्षमता अभी तक पूरे समाज में वितरित नहीं हो पाई है। मेरे किसानों, मजदूरों, आदिवासियों की जरूरतें अभी अधूरी हैं। उनकी आशाएँ टूटती-बिखरती हैं जब उद्योग नहीं लगते, जब रोजगार नहीं मिलता, और जब मूलभूत सुविधाएँ दूर-दूर तक जगमगाती नहीं दिखतीं। लेकिन मेरा विश्वास मेरी आत्मा में जिंदा है। मैं यह भी जानता हूँ कि संघर्ष में ही मेरी शक्ल आकार लेती है। मैं झारखंड हूँ एक आत्म-विश्वासी राज्य, लेकिन हिम्मत नहीं खोया। मैं उन सपनों और उम्मीदों की मूरत हूँ जो मेरे लोगों ने मुझे देते समय सजाई थीं। और आज, मेरी 25वीं जयंती पर, मैं खुद से वादा कर रहा हूँ, कि मैं अपनी खोई पहचान को फिर से पा कर, हर उस घर में उजाला लाऊँगी जहाँ अभी आशाएं बुझी हैं। मैं सिर्फ खनिजों की धरती नहीं हूँ, मैं हृदय हूँ, भविष्य हूँ, और संभावनाओं का एक उज्जवल परिदृश्य हूँ। इस 25 साल के सफर में मेरे संघर्षों ने मुझे मजबूत बनाया है, और अब मेरी आँखों में नयी चमक है मैं अभी बहुत कुछ देने, बहुत कुछ बनने की राह पर हूँ। मैं झारखंड हूँ और मेरी कहानी अभी बाकी है।